Hemkund sahib हेमकुण्ड साहिब या ‘गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब जी’ सिक्खों का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, जो उत्तराखंड के चमोली ज़िले में स्थित है। हेमकुंड एक बर्फ की झील है, जो सात विशाल पर्वतों से घिरी हुई है, जिन्हें हेमकुंड पर्वत भी कहते हैं। हेमकुंड साहिब की यात्रा हिन्दुओं की पवित्र अमरनाथ यात्रा से भी जोड़ कर देखी जाती है।  यह हिमालय में 4632 मीटर (15,200 फुट) की ऊँचाई पर एक बर्फ़ीली झील किनारे सात पहाड़ों के बीच स्थित है। इन सात पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं। इस तक ऋषिकेश-बद्रीनाथ साँस-रास्ता पर पड़ते गोबिन्दघाट से केवल पैदल चढ़ाई के द्वारा ही पहुँचा जा सकता है। यहाँ गुरुद्वारा श्री हेमकुंट साहिब सुशोभित है। इस स्थान का उल्लेख गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित दसम ग्रंथ में आता है। इस कारण यह उन लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है जो दसम ग्रंथ में विश्वास रखते हैं।

शीतकाल में बर्फबारी से ढंके रहने के कारण हेमकुंड साहिब जाने के लिए तीर्थयात्रियों को अनुमति नहीं रहती है। बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर गोविंदघाट से करीब 21 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद ही हेमकुंड साहिब पहुंचा जाता है। घांघरिया से हेमकुंड साहिब तक करीब छह किलोमीटर के बीच कई जगहों पर बर्फ को काटकर रास्ता बनाया गया है।

हेमकुंड साहिब उत्तराखंड पहाड़ी

यहाँ पहले एक मंदिर था जिसका निर्माण भगवान राम के अनुज लक्ष्मण ने करवाया था। सिखों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह ने यहाँ पूजा अर्चना की थी। बाद में इसे गुरूद्वारा धोषित कर दिया गया। इस दर्शनीय तीर्थ में चारों ओर से बर्फ़ की ऊँची चोटियों का प्रतिबिम्ब विशालकाय झील में अत्यन्त मनोरम एवं रोमांच से परिपूर्ण लगता है। इसी झील में हाथी पर्वत और सप्त ऋषि पर्वत श्रृंखलाओं से पानी आता है। एक छोटी जलधारा इस झील से निकलती है जिसे हिमगंगा कहते हैं। झील के किनारे स्थित लक्ष्मण मंदिर भी अत्यन्त दर्शनीय है। अत्यधिक ऊँचाई पर होने के कारण वर्ष में लगभग ७ महीने यहाँ झील बर्फ में जम जाती है। फूलों की घाटी यहाँ का निकटतम पर्यटन स्थल है।

इसके अलावा जोशी मठ से 40 किमी दूर सिख समाज का प्रसिद्ध तीर्थ हेमकुंड साहिब है, जहां गुरुगोविंद सिंह ने तपस्या की थी। यहां हिमालय की चोटियों के बीच चारों ओर बर्फ के पहाड़ हैं। बीच में विशाल सरोवर (बर्फीली झील) है। वहीं हेमकुंड गुरुद्वारा बनाया गया है। यह गुरुद्वारा चार महीनों तक खुला रहेगा। अक्टूबर में बर्फ गिरने के साथ ही इसके कपाट बंद कर दिए जाते हैं।

यहाँ गुरुद्वारा श्री हेमकुंट साहिब सुशोभित है। इस स्थान का उल्लेख गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित दसम ग्रंथ में आता है। इस कारण यह उन लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है जो दसम ग्रंथ में विश्वास रखते हैं।

हेमकुंड साहिब-गुरुद्वारा में उत्तराखंड

गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब सिखों का प्रमुख तीर्थ स्थल है और हेमकुंड झील के तट पर स्थित है। यह जगह धार्मिक महत्व रखती है, क्यूंकि सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने यहाँ सालों मध्यस्थ किया था।तीर्थस्थान के अंदर जाने से पहले, सिख, झील जो पास में स्थित है उसके पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं।

झील का पानी बहुत ठंडा है, और वहाँ पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग कक्ष हैं जहां वे पवित्र डुबकी लगते हैं। भक्तगण पास की दुकानों से छोटे स्मृति चिन्ह भी खरीद सकते हैं। गुरुद्वारा के अंदर, भक्तों चाय और खिचड़ी के साथ कराह प्रशाद दिया जाता है, जो चीनी, गेहूं के आटे और घी के बराबर भागों का उपयोग कर तैयार किया जाता है।
कराह प्रशाद सभा के बाद भक्तों को दिया जाता है। सभा के दौरान, सिख प्रार्थना करते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब के पृष्ठ के शीर्ष बाएं हाथ की ओर हुकाम्नमा पढ़ते हैं। गुरुद्वारा वर्ष 1960 में बनाया गया था, जब मेजर जनरल हरकीरत सिंह, भारतीय सेना के मुख्य अभियंता ने इस जगह का दौरा किया था। बाद में, वास्तुकार सैली ने गुरुद्वारा के निर्माण का प्रभार लिया था।

सिखों के सबसे बड़े धार्मिक स्थल हेमकुंड साहिब के कपाट खुलने में अभी लगभग एक महीने से भी ज्यादा का वक्त है लेकिन कपाट खुलने से पहले ही देश-दुनिया में बैठे श्रद्धालुओं के लिए हम लेके आए हैं गुरू गोविन्द सिंह जी की गद्दी के आलोकिक दर्शन। इस वर्ष जहां जनवरी-फरवरी में पहाड़ों में बर्फ़बारी कम देखी गयी, वहीं मार्च और अप्रैल में हुई बर्फ़बारी के बाद 4632 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हेमकुंड साहिब में दस फीट से अधिक बर्फ अभी भी जमी हुई है। हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे का ज्यादातर हिस्सा बर्फ में दबा हुआ है साथ ही पवित्र सरोवर में भी अभी तक बर्फ जमी हुई है। घांघरिया से हेमकुंड साहिब तक 6 किलोमीटर मार्ग पर 6 से 7 फीट बर्फ की मोटी चादर बिछी हुई है, जिसको सेना द्वारा जल्द हटाया जाएगा।

मार्ग-टू-हेमकुंड साहिब-में उत्तराखंड

गोविंद घाट से हेमकुंट साहिब तक के 21 किलोमीटर के पैदल यात्री मार्ग, विशेष रूप से अटलाकोटी से पिछले 3 किमी लंबी खिंचाव, जो 5-8 फीट-उच्च बर्फ वाले बिस्तर के माध्यम से कट जाता है, एक मोटा पैच है। लेकिन यह मंदिरों के लिए 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित तीर्थस्थल बनाने के लिए जवान और बूढ़े लोगों को एकदम से ट्रिगर नहीं करता है। देश रक्षा के लिए सीमा पर मोर्चा संभालने वाले हमारी सेना के जवान साहसिक कार्यों में भी पीछे नहीं हटते हैं। खासकर उत्तराखंड में जहां हर मुश्किल घड़ी में सेना फरिश्ता बनकर मदद के लिए पहुंचती है। यहां सेना के जांबाजों ने यह भी साबित कर दिखाया है कि बुलंद इरादों के आगे चट्टान की तरह मजबूत बर्फ को काटना भी मुश्किल नहीं है।

ताजा उदाहरण हेमकुंड साहिब यात्रा का है। यहां 19 दिन की कड़ी मेहनत के बाद सेना की 18 इंजीनियरिंग कोर के 30 जांबाज जवानों ने पैदल मार्ग को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया है। तीन किमी का यह रास्ता बर्फ काटकर बनाया गया है। यहां कई जगह पर आठ से दस फीट तक बर्फ जमी हुई थी। अटलाकोटी क्षेत्र में बड़े-बड़े हिमखंडों को काटकर बर्फ के बीच से सेना के जवानों ने पैदल मार्ग बनाने में कामयाबी हासिल की है।
सेना के जवानों ने सीमित संसाधन होने के बावजूद रिकॉर्ड समय में लक्ष्य पूरा किया। क्योंकि इतनी ऊंचाई पर बड़ी मशीनें पहुंचाना संभव नहीं है। ऐसे में सीमित उपकरणों के साथ सेना के जवानों ने स्थानीय लोगों की मदद से चट्टान की तरह जमी बर्फ को काटकर रास्ता तैयार किया। अब यात्री इस पैदल मार्ग से आवाजाही कर सकेंगे। हालांकि घोड़े और खच्चरों को धाम में पहुंचने में कुछ समय लगेगा।

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