Haji Ali Dargah महाराष्ट्र राज्य के मुंबई शहर में स्थित एक मशहूर मस्जिद एवं दरगाह है। यह प्रसिद्ध दरगाह अरब सागर के तट पर बने ‘महालक्ष्मी मंदिर’ के समीप स्थित है। अरब सागर के बीच 19वीं सदी के पूर्वाद्ध में बनी मुंबई की यह प्रसिद्ध दरगाह जमीन से 500 गज दूर समुद्र में स्थित है। यह दरगाह मुस्लिम और हिन्दू ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी समान रूप से आस्था और विश्वास का केंद्र है। दरगाह तक पहुँचने के लिए एक छोटा-सा पगडंडीनुमा रास्ता है, जिसके माध्यम से दरगाह तक तभी पहुँचा जा सकता है, जब समुद्र में ज्वार न हो, अन्यथा रास्ता पानी में डूब जाता है। रात्रि में दूर से देखने पर हाजी अली दरगाह का नज़ारा इतना दिलकश होता है, जैसे दरगाह और मस्जिद का गुम्बद समुद्र की लहरों पर तैर रहे हों। मुंबई के वर्ली सी फ़ेस में स्थित हाजी अली मस्जिद का एक प्रमुख दर्शनीय स्थल है। यह मस्ज़िद समुद्र के बीच एक चट्टान पर स्थित है और यह एक लंबे कृत्रिम घाट के माध्यमसे तट से जुड़ी हुई है जिस पर से तीर्थ यात्रियों की भीड़ दरगाह की ओर जाती आती है। किसी भी धर्म, जाति या मूल का व्यक्ति अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार हाजे अली दरगाह का अनुभव अवश्य लेता है। आपको यह सलाह दी जाती है कि यदि आप बहुत ज़्यादा धार्मिक नियमों का पालन नही करते तो शुक्रवार का दिन यहाँ की सैर के लिये उपयुक्त नही है क्योंकि इस दिन यहाँ बहुत ज़्यादा भीड़ होती है।

हाजी अली दरगाह

हाजी अली की दरगाह मुंबई के वरली तट के निकट स्थित एक छोटे से टापू पर स्थित एक मस्जिद एवं दरगाह हैं। इसे सय्यद पीर हाजी अली शाह बुखारी की स्मृति में सन 1431 में बनाया गया था। यह दरगाह मुस्लिम एवं हिन्दू दोनों समुदायों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है। यह मुंबई का महत्वपूर्ण धार्मिक एवं पर्यटन स्थल भी है। दरगाह को सन 1431 में सूफी संत सय्यद पीर हाजी अली शाह बुखारी की स्मृति में बनाया गया था। हाजी अली ट्रस्ट के अनुसार हाजी अली उज़्बेकिस्तान के बुखारा प्रान्त से सारी दुनिया का भ्रमण करते हुए भारत पहुँचे थे। रमजान के पवित्र महीने की शुरुआत हो चुकी है..इसी क्रम में हमने आपको रमजान स्पेशल सीरिज में हम लगातार आपको उन डेस्टिनेशनों से अवगत करेंगे जहां जाकर आप इस पवित्र महीने के बारे में और अधिक जान सकते हैं।

हाजी अली

यह मुस्लिम और हिन्दू दोनों धर्मों के साथ-साथ अन्य धर्म के लोगों के लिए भी धार्मिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस दरगाह में सूफी संत सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की कब्र स्थित है। इसे मुंबई की सीमा भी माना जाता है। इस दरगाह की स्थापना से जुड़ी एक चर्चित कथा निम्न है।  एक कथा के अनुसार उज़्बेकिस्तान के बुखारा प्रांत में हाजी अली नाम का व्यक्ति रहता था। वह बहुत ही धनी और व्यापारी परिवार में जन्मे थे। एक बार की बात है, हाजी अली भ्रमण करने के लिए निकले। वह भ्रमण करते हुए भारत पहुंचे तथा मुंबई जा कर बस गए। कुछ दिन बीत जाने के बाद वहां हाजी अली का भाई आया और उसने उन्हें घर लौटने को कहा परंतु हाजी अली नहीं लौटे। उन्होंने भाई के हाथों अपनी माता के लिए एक पत्र भेजा। पत्र में लिखा था “मैं अब ना लौटूंगा यहीं रहकर इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार करूंगा।”

इसके बाद पीर हाजी अली बुखारी (Peer Haji Ali Bukhari) ने मुंबई में रहकर लोगों को इस्लाम की शिक्षा दी। कुछ समय के बाद जब उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा तो उन्होंने अपने अनुयायियों को बुलाया और कहा कि मृत्यु के बाद मेरे शव को किसी कब्रिस्तान में दफनाने की जगह उसे समुद्र में बहा देना और जिस जगह लोगों को उनका ताबूत मिले उसे वहीं दफना दिया जाए। हाजी अली (Haji Ali) के अनुयायियों ने उनकी इस बात को माना और उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को ताबूत में बंद कर समुद्र में बहा दिया। यह एक चमत्कार है कि वह ताबूत नह्कार वापस मुंबई की तरफ आ गया और समुद्र में उठी चट्टानों के एक छोटे से टीले पर रुक गया। इसके बाद हाजी अली के अनुयायियों ने उस स्थान पर हाजी अली का दरगाह बना दिया। कई लोग यह भी मानते हैं कि संत हाजी अली की समुद्र में डूब जाने से मृत्यु हो गई थी और उसी जगह उनके अनुयायियों ने इस खूबसूरत दरगाह (Haji Ali Dargah) का निर्माण कर दिया।

हाजी अली

हाजी अली दरगाह सफ़ेद रंग से रंगी है तथा क़रीब 4500 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैली है। यह एक 85 फिट ऊँची मीनार से शोभायमान है। एक बड़े से प्रवेश द्वार के अंदर मुख्य दरगाह स्थित है। दरगाह के अंदर संत हाजी अली शाह बुखारी का मक़बरा एक चटख लाल रंग तथा हरे रंग की चादर से ढंका रहता है। मुख्य परिसर में स्तम्भों पर कांच की सुन्दर नक़्क़ाशी की गई है। मुस्लिम पंथ के अनुसार यहाँ पर भी पुरुषों तथा महिलाओं के लिए अलग प्रार्थना स्थल बनाये गए हैं। लगभग 400 साल पुरानी इस दरगाह का जीर्णोद्धार कार्य भी किया गया है। हाजी अली दरगाह का प्रांगण खाद्य सामग्री की दुकानों तथा अन्य दुकानों से सजा हुआ है, जो इस जगह की गंभीरता तथा नीरसता को दूर करती हैं। हाजी अली की दरगाह मुंबई की विरासत तथा भारत की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है।

हाजी अली की दरगाह मुंबई के वर्ली तट के निकट स्थित एक छोटे-से टापू पर स्थित है। मुख्य भूमि से यह टापू एक कंक्रीट के जलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। दरगाह के अंदर मुस्लिम संत सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की क़ब्र है। दरगाह को हाजी अली शाह बुखारी की स्मृति में सन 1431 में बनाया गया था।

यह दरगाह इस्लामी स्थापत्य कला का एक नायाब नमूना है। सैयद पीर हाजी अली तत्कालीन फ़ारस साम्राज्य बुखारा नामक स्थान के निवासी थे। वे 15वीं शताब्दी में दुनिया घूमने के बाद मुम्बई आकर बस गये थे। कहा जाता है कि हाजी अली शाह बुखारी मक्का जाते समय यहाँ डूब गये थे। इसीलिए इस जगह पर मस्जिद एवं दरगाह बनवा दी गई थी। हाजी अली शाह मस्जिद 4500 मीटर के क्षेत्र में बनी हुई है। शायद दुनिया में यह अपनी तरह का एकमात्र धर्म स्थल है, जहाँ एक दरगाह और एक मस्जिद समुद्र के बीच में टापू पर स्थित है और जहाँ एक ही समय पर हज़ारों श्रद्धालु एक साथ धर्मलाभ ले सकते हैं। प्रत्येक शुक्रवार को यहाँ सूफ़ी संगीत व कव्वाली की महफिल सजती है। बृहस्पतिवार और शुक्रवार को यहाँ सभी धर्मों के लगभग पचास हज़ार से ज़्यादा लोग दुआ माँगने पहुँचते हैं।

हाजी अली दरगाह

परिवहन: – दरगाह तक पहुँचना बहुत हद तक समुद्र की लहरों की तीव्रता पर निर्भर करता है, क्योंकि जलमार्ग पर रेलिंग नहीं लगी हैं। जब कभी समुद्र में उच्च तीव्रता की लहरें आती हैं तो यह जलमार्ग पानी में डूब जाता है तथा दरगाह तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। अतः दरगाह पर निम्न तीव्रता की लहरों के दौरान ही पहुँचा जा सकता है। इस जलमार्ग से आधा किलोमीटर का यह पैदल सफ़र बड़ा ही मोहक तथा रोमांचकारी होता है। कम लहरों के दौरान पूरे रास्ते के सफ़र के दौरान तीन-चार बार तो यात्रियों के पैर जलमग्न हो ही जाते है। इस सफ़र के दौरान कई बार लहरें एक बड़े फ़व्वारे के रूप में आती हैं तथा यात्रियों को भिगोकर कर चली जाती हैं।

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