सोनागिरी मंदिर Sonagiri Temple

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Sonagiri Temple सोनागिरि ग्वालियर से लगभग 60 किमी दूर, छोटी पहाड़ियों पर 9 वीं और 10 वीं शताब्दी के जैन मंदिर हैं। चंद्र-पवित्र (8 वें तेरथंकर) के समय से स्वयं और अनुष्ठान, तपस्या के लिए अभ्यास करने के लिए भक्तों और संन्यासी संतों में यह पवित्र स्थान लोकप्रिय है, यहां से पांच और आधा करोड़ संन्यासी संतों ने मोक्ष को यहां से प्राप्त किया है। निकटतम रेलवे स्टेशन दूर सोनागिर , 5 किमी दूर है।मध्य- प्रदेश के दतिया जिले में है और जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है ! ऐसा कहा जाता है की नंग अनंग कुमार ने यहाँ से मोक्ष प्राप्त करके जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाई थी ! 8 वे तीर्थंकर चंदप्रभ स्वामी का यहाँ 17 बार समवशरण आया था और साढ़े 5 करोड़ मुनियों ने यह से मोक्ष प्राप्त किया है ! पहाड़ी पर 76 जैन मंदिर है और 26 मंदिर गाव में है! पहाड़ी का जो 57 नंबर का मंदिर है वेह मुख्या मंदिर चंद्प्रभ भगवान् की मुलनायक प्रतिमा से युक्त है जो 17 फीट ऊँची है ! सोनागिरी जैसे अनोखे स्थान को छोटा सम्मेद शिखरजी भी कहते है ! जो 32 एकड़
की 2 पहाडियों से जुदा हुआ है! सचित्र प्रमाणों के आधार पर इस क्षेत्र को ईसा पूर्व की तीसरी शताब्दी का सिद्ध किया था।

सोनगिरि मध्य प्रदेश के दतिया से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। झाँसी-दतिया मुख्य रेलवे लाइन पर स्थित सोनगिरि एक मुख्य तीर्थ स्थान है। यह स्थान और यहाँ के मन्दिर जैन धर्म के ‘दिगम्बर सम्प्रदाय’ के पवित्रतम स्थान है। इतिहास में सोनगिरि क्षेत्र पर भट्टारकों की चार गट्टियाँ रही थीं, जो ग्वालियर के भट्टारकों की शाखा के रूप में स्थापित हुई थीं। इस तीर्थ स्थल को प्रकृति ने अपनी भरपूर छटा से संवारा, इतिहास ने स्तुत्य गौरव प्रदान किया और अधयात्म ने इसे तपोभूमि बनाकर निर्वाण के कारण सिद्ध क्षेत्र बनाया है। यह पवित्र स्थान भक्तों और संन्यासी संतों में स्वयं-अनुशासन, तपस्या के लिए अभ्यास करने और भगवान चंद्रप्रभु (8 वीं तेरथंकर) के समय से निर्वाण (साल्वेशन) प्राप्त करने के लिए लोकप्रिय है, पांच और आधे करोड़ संन्यासी संतों ने मोक्ष (मोक्ष या निर्वाण) यहां से। भगवान चंद्राप्रू का समवेशन यहाँ 17 बार आया था। नांग, अनंग, चिंतागती, पूर्णाचंद, अशोकन, श्रीदत्ता, स्वर्णभद्र और कई अन्य संतों ने यहां से मुक्ति प्राप्त की। यह एक अनोखी जगह है जिसे लाघू सम्मीत शिखर के नाम से जाना जाता है जिसमें दो पहाड़ियों की 132 एकड़ क्षेत्र के क्षेत्र को कवर किया जाता है। यहां पर 77 खूबसूरत जैन मंदिर हैं, जो कि आकाश में उच्च गति वाले हैं, उनके बीच मंदिर संख्या 57 मुख्य है। आचार्य शुभ चंद्र और भारतीहारी यहां आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए यहां काम करते थे। उन्होंने यहां कुछ ग्रंथों को भी पूरा किया

सोनगिरि का प्राचीन नाम ‘श्रमणांचल’, ‘श्रमणगिरि’ और ‘स्वर्णगिरि’ रहा है। जैन परंपरा के अनुसार सोनगिरि से करोडों साधुओं ने निर्वाण की प्राप्ति की और अष्टम तीर्थंकर चन्द्रप्रभ के समवरण का भी यहाँ अनेक बार आगमन हुआ था। अर्थात “श्रीपुर के महाराजा अरिंजय, मालव देश के महामण्डलिक सम्राट धनंजय और तिलिंग देश के महाबली नरेश अमृत विजय और 1500 अन्य राजा महाराजाओं ने इस तीर्थ से चन्द्रप्रभ भगवान के समवरण में दीक्षा ली थी। महाराज असिंजय के विलक्षण पुत्र नंग और अनंग दोनों राजकुमारों ने उत्तम राजभोग त्यागकर भरी जवानी में चन्द्रप्रभ की देशना से प्रभावित होकर ‘जिन’ दीक्षा ग्रहण की थी। उज्जैन के महाराज श्रीदत्त इन्हीं मुनिवरों के प्रभाव से 2000 राजाओं के साथ दिगम्बर मुनि हुये थे। भारतवर्ष के बुन्देलखण्ड क्षेत्र तथा वर्तमान मध्य प्रदेश के दतिया जिले में अवस्थित सोनागिरि सिद्धक्षेत्र बड़ा महत्त्वपूर्ण तीर्थ क्षेत्र है। जैन संस्कृति का प्रतीक यह क्षेत्र वास्तव में विन्ध्य भूमि का गौरव है। र्धािमक जनता के लिये प्रेरणा स्रोत है तो पर्यटकों के लिये दर्शनीय स्थल और कला मर्मज्ञों एवं पुरातत्त्वज्ञों के लिये अध्ययन क्षेत्र है। सोनागिरि जिसका प्राचीन नाम श्रमणगिरि या स्वर्णगिरि है। यह बहुत ही सुन्दर एवं मनोरम पहाड़ी है। रेलगाड़ी से ही सोनागिरि के मन्दिरों के भव्य दर्शन होते हैं। मन्दिरों की पंक्ति स्वभावत: दर्शकों का मन मोह लेती है। सुन्दर पहाड़ी पर मन्दिरों की माला और प्रकृति की बूटी निरखते ही बनती है। इस पहाड़ी से नंगानंग कुमारों सहित साढ़े पाँच कोटि मुनिराज मोक्ष गये और अष्टम् तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभु का समवसरण लगभग १५ बार यहाँ आया था।

सोनगिरी के मन्दिर जैन धर्म के ‘दिगम्बर सम्प्रदाय’ के पवित्र तीर्थ स्थान हैं। इसी स्थान पर राजा नंगनाग ने अपने 15 मिलियन अनुयायियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। भक्तगणों और संतों के बीच यहाँ के मन्दिर बहुत लोकप्रिय है। वे यहाँ आकर मोक्ष प्राप्ति और आत्मानुशासन का अभ्यास करते हैं। सोनगिरि में प्राकृतिक रमणीयता से परिपूर्ण पहाड़ पर प्राचीन 77 शिखर युक्त जैन मन्दिर है। तलहटी में आबादी भी है, जिसे ‘सनावल’ गाँव के नाम से जानते हैं। पर्वत के अतिरिक्त तलहटी में अठारह जैन मन्दिर और पन्द्रह धर्मशालायें भी तीर्थ यात्रियों की सुविधा हेतु निर्मित हैं। आधुनिक निर्माण जारी है। पहाड़ी पर बना 57 नंबर का मन्दिर यहाँ का मुख्य मन्दिर है। इस मन्दिर में जैन तीर्थंकर चन्द्रप्रभ की ग्यारह फीट ऊंची आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। यहाँ भगवान शीतलनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थंकर की भी सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित हैं। सोनागिरि का 57 मुख्य जिनालय तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का है, जो प्रकृति के क्रीड़ाकंन में अपनी विशालता, रमणीयता सिद्धता के लिये विख्यात है। इस जिनालय में मूलनायक तीर्थंकर चन्द्रप्रभ की 12 फुट ऊँची कायोत्यर्ग प्रतिमा है। शिल्पकार ने इस मूर्ति में देशी पाषाण पर सर्वांग शौष्ठव का इतना सजीव उत्कीर्णन किया है कि चन्द्रप्रभ की विहंसित और ध्यानस्थ मूर्ति के सामने जाते ही दर्शक भाव विभोर हो नतमस्तक हो जाता है। इसके गर्भगृह में दो लेख देवनागरी लिपि में हैं। एक शिलालेख में 1233 विक्रम संवत अंकित है। चन्द्रप्रभ प्रतिमा के एक शिलालेख में संवत् 335 मात्र ही पढने में आता है। विद्वानें का मत है कि यह 1335 संवत् रहा होगा। प्रथम अंक 1 दब या मिट गया प्रतीत होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा पर्वत में ही उकेरी गई है। आगे इसी जिनालय में 6.50 फुट ऊँची पार्श्वनाथ तीर्थंकर की प्रतिमा है। आगे की वेदिका पर तीर्थंकर नेमीनाथ, पार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ और शांतिनाथ की श्वेतवर्ण प्रतिमायें है। अंत में 9 फणों वाली पद्मासन मुद्रा में सुपार्श्वनाथ की मूर्ति है, जिसका चिन्ह स्वस्तिक नीचे अंकित है। चन्द्रप्रभ भगवान के विशाल मन्दिर के आगे मानस्तम्भ है।

यात्रा करने के लिए उचित समय :- लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की सैर आदि के लिए दतिया आने का उत्तम समय अक्टूबर से मार्च के बीच का रहता है।

वायु मार्ग – ग्वालियर दतिया का निकटतम हवाईअड्डा है। ग्वालियर पहुँचकर बस या टैक्सी के माध्यम से आसानी से दतिया पहुँचा जा सकता है।

रेल मार्ग – दतिया रेलवे स्टेशन दिल्ली-चैन्नई मुख्य रेल लाइन पर पड़ता है। दिल्ली, आगरा, मथुरा, ग्वालियर, झांसी, भोपाल आदि शहरों से अनेक रेलगाड़ियाँ दतिया से होकर जाती हैं। दतिया शहर से दतिया रेलवे स्टेशन क़रीब तीन कि.मी. दूर है।

सड़क मार्ग – दतिया, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है। दोनों राज्यों के अनेक शहरों से यहाँ के लिए नियमित बसों की व्यवस्था है। झांसी, ग्वालियर, मथुरा, डबरा, आगरा, ओरछा आदि शहरों से यहाँ के लिए राज्य परिवहन निगम की नियमित बसें चलती रहती हैं।

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