रकाबगंज साहिब Rakabganj sahib

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Rakabganj sahib गुरूद्वारा शीश गंज साहिब, दिल्‍ली के नौ ऐतिहासिक गुरूद्वारों में से एक है। इस गुरूद्वारे का रोचक इतिहास है। यह गुरूद्वारा, सिक्‍खों के नौवें गुरू, गुरू तेग बहादुर सिंह की स्‍मृति में बनवाया गया था। इसी जगह गुरू तेग बहादुर को मौत की सजा दी गई थी, जब उन्‍होने मुगल बादशाह औरंगजेब के इस्‍लाम धर्म को अपनाने के प्रस्‍ताव को ठुकरा दिया था और इंकार कर दिया था।

गुरुद्वारा रकब गंज साहिब नई दिल्ली में संसद भवन के पास एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। यह 1783 में बनाया गया था, सिख सेना के नेता बाघेल सिंह (1730-1802) ने 11 मार्च 1783 को दिल्ली पर कब्जा कर लिया था, और दिल्ली में उनके संक्षिप्त प्रवास ने शहर के भीतर कई सिख धार्मिक स्थलों के निर्माण का नेतृत्व किया। नवंबर 1675 में औरंगजेब के आदेशों के तहत हिंदू कश्मीरी पंडितों को बचाने के लिए, यह 9 वीं सिख गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी के शवों के स्थल का प्रतीक है। गुरुद्वारा साहिब रायसीना पहाड़ी के पास पुराने रायसीना गांव के पास बनकर बना है, वर्तमान में पंडित पंत मार्ग ने 12 साल का निर्माण किया। इससे पहले, मौके के पास एक मस्जिद का निर्माण किया गया था; अंततः बाद में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने वहां एक गुरुद्वारा साहिब का निर्माण करने की अनुमति दी.

श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी से धरती-अंबर काँप उठे| दुनिया का चप्पा-चप्पा शहादत के आगे नतमस्तक था जिसने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपनी शहीदी दे दी| घोड़ियों लक्खी शाह और उसके पुत्र पांच सौ बैल व गाड़ियों को चांदनी चौंक से गुजरते हुए श्री गुरु तेग बहादुर जी का धड़ अपने घर रकाब-गंज गांव में ले गए| उन्होंने अपने मकान (हवेली) में ही गुरु जी की देह को श्रद्धा व सत्कारपूर्वक रखकर मकान को ही आग लगा दी| मुगल शाही फौजों ने चारों तरफ गुरु साहिब के सीस व धड़ को खोजने की कोशिश की| परन्तु उनकी हर प्रयत्न विफल रहे| जिस स्थान पर लक्खी शाह ने अपने मकान में गुरु साहिब का संस्कार किया| वही स्थान रकाब-गंज गुरुद्वारा सुशोभित है| गुरुद्वारा सीस गंज व गुरुद्वारा रकाब गुरूद्वारे में कुछ ऐतिहासिक शस्त्र भी है| गुरुद्वारा सीस गंज में श्रद्धालुओं व यात्रियों के लिए लंगर हमेशा चलता रहता है| यहां सीनियर सेकण्डरी स्कूल भी है| और यह अच्छी सराय भी बनाई गई है| श्री गुरु नानक देव जी का जन्म दिन व श्री गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी गुरुपुर्व गुरुद्वारा सीसगंज व गुरुद्वारा रकाब गंज में हर साल मनाया जाता है| श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म दिन व श्री गुरु अर्जुन देव जी का शहीदी पर्व गुरुद्वारा रकाबगंज में मनाया जाता है|

दशकों बाद, गुरू तेग बहादुर के कट्टर अनुयायी बाबा बघेल सिंह ने इस जगह को ढूंढ निकाला जहां गुरू जी को मौत की सजा मिली थी, और उन्‍होने गुरू जी के सम्‍मान में एक भव्‍य गुरूद्वारे का निर्माण करवा दिया। यह गुरूद्वारा, दिल्‍ली के पॉश इलाके चांदनी चौक में स्थित है।
यह गुरूद्वारा 1930 में बनाया गया था, इस जगह अभी भी एक ट्रंक रखा जिससे गुरू जी को मौत के घाट उतार दिया गया था। गुरूद्वारा के निकट लाल किला, फिरोज शाह कोटला और जामा मस्जिद भी अन्‍य आकर्षण हैं।

गुरुद्वारा यह स्थल है, जहां लक्ष्मी शाह बंजारा और उनके पुत्र भाई नागराय ने अपने स्वयं के घर को सिख गुरु गुरु तेग बहादुर साहब के शरीर का संस्कार करने के लिए जला दिया था, जो 11 नवंबर 1675 को चांदनी चौक में शिरोमणि से शहीद हुए थे। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस्लाम को बदलने में मना कर दिया उस स्थान पर जहां गुरु साहब का सिर काट दिया गया था, वहां गुरुद्वारा सीस गंज साहिब द्वारा चिह्नित किया गया है। गुरु साहब का कटे हुए सिर को दिल्ली से लेकर आनंदपुर साहिब तक पंजाब में भाई जीता जी (बाद में भाई जीवन सिंह) के द्वारा लाया गया था और उनके पुत्र, गुरु गोबिंद राय, जो बाद में गुरु गोबिंद सिंह, सिखों के दसवें गुरु थे, उनके अंतिम संस्कार थे। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति इस साइट पर 1984 के सिख विरोधी नरसंहार के दौरान मारे जाने वाले सिखों को स्मारक बनाने की योजना बना रही है। यद्यपि स्मारक के लिए नींव का पत्थर रखा गया है, दिल्ली उच्च न्यायालय स्मारक के निर्माण को चुनौती देने वाली एक याचिका पर विचार कर रहा है

तरावड़ी (तराईन) करनाल जिले का ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है। यह अंबाला-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग नं. 1 से लगभग 2 किलोमीटर तथा राष्ट्रीय रेलमार्ग से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह वही स्थान है जहां पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को युद्ध में कई बार हराया था परन्तु 1192 की अंतिम लड़ाई में वह अपने मौसेरे भाई जयचंद की गद्दारी के कारण हार गया। यहां पर पृथ्वीराज के समय का एक ऐतिहासिक किला अभी भी मौजूद है जो जीर्ण-क्षीर्ण अवस्था में है। उसमें काटजू नगर के नाम से रिहायशी बस्ती बनी हुई है। किले से कुछ दूरी पर पूर्व दिशा की ओर इस कस्बे का एक और महान धार्मिक एवं ऐतिहासिक गुरुद्वारा शीशगंज स्थित है जहां पर हिन्दू-सिख एवं अन्य धर्मों के लोग शीश नवाते हैं। जैसा कि ऐतिहासिक पट्टी पर लिखा हुआ है, यह गुरुद्वारा नौवीं पातशाही गुरु तेगबहादुर जी से सबंधित है –
साधन हेत इति जिन करी, सीस दिया पर सी ना उचरि।
तिलक जंझू राखा प्रभु ताका, कीनो बड़ो कलू महि साका॥

यात्रा करने के लिए उचित समय :- दिल्ली घूमने का सही समय अक्टूबर से मार्च है। दिल्ली देखने के लिए बेस्ट टाइम वैसे तो पूरा साल ही है और यहां की सर्दी भी वल्र्ड फेमस है लेकिन अगर आप ज्यादा गर्मी, और सर्दी में नहीं जाना चाहते तो आप अक्टूबर, नवंबर, फरवरी और मार्च में आ सकते हैं तब आपको मौसम बेहद सुहावना मिलेगा।

परिवहन: – दिल्ली भारत के सभी प्रमुख शहरों से हवाई, रेल और बस सेवा ये जुड़ा है। दिल्ली विदेशी शहरों की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों से जुड़ा हुआ है। हते है तो अपनी यात्रा को पांच अलग-अलग समूह में बांट सकते हैं। दिल्ली हमेशा से एक रोचक शहर रहा है जहां एक विश्वव्यापी संस्कृति है। दिल्ली भारत की राजधानी ही नहीं पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र भी है।

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