Moinuddin Chishti’s Dargah मुईनुद्दीन चिश्ती (पूरा नाम ‘ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह’; जन्म- 1141, ईरान; मृत्यु- 1230, अजमेर, राजस्थान) एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत थे। उन्होंने 12वीं शताब्दी में अजमेर में ‘चिश्तिया’ परंपरा की स्थापना की थी। माना जाता है कि ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती सन 1195 ई. में मदीना से भारत आए थे। इसके बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन अजमेर (राजस्थान) में ही लोगों के दु:ख-दर्द दूर करते हुए गुजार दिया। वे हमेशा ईश्वर से यही दुआ किया करते थे कि वह सभी भक्तों का दुख-दर्द उन्हें दे दे तथा उनके जीवन को खुशियों से भर दे। भारत के राजस्थान राज्य के प्रसिद्ध शहर अजमेर को कौन नहीं जानता । यह प्रसिद्ध शहर अरावली पर्वत श्रेणी की तारागढ़ पहाड़ी की ढाल पर स्थित है । यह शहर हिन्दू मुस्लिम सिख आदि सभी धर्मों जातियों की एकता के प्रतिक सूफ़ी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की प्रसिद्ध अजमेर शरीफ दरगाह के लिए जाना जाता है । अजमेर शरीफ दरगाह में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का मकबरा है । जो ख्वाजा गरीब नवाज के नाम से भी जाने जाते है । अजमेर शरीफ दरगाह का भारत में बड़ा महत्व है । इस दरगाह के बारे में मान्यता है की यहाँ जो भी मन्नतें मांगी जाती है वो पूरी हो जाती है । यहाँ की खास बात यह है कि ख्वाजा गरीब नवाज़ पर हर धर्म के लोगों का विश्वास है । यहाँ आने वाले श्रद्धालु चाहे वो किसी भी धर्म से क्यों न हो । ख्वाजा के दर की जियारत कर रूहानी सकून प्राप्त करते है। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के जायरीनों में मुग़लकाल से ही बडे ओहदेदार शासक बादशाह रहे है ।आज भी यहाँ राजनेता अभिनेता आदि प्रसिद्ध हस्तियां जियारत के लिए निरंतर आती रहती है ।

Moinuddin-Chisti-Dargah-Ajmer

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती 536 हिजरी (1141 ई.) में ख़ुरासान प्रांत के ‘सन्जर’ नामक गाँव में पैदा हुए थे। ‘सन्जर’ कन्धार से उत्तर की स्थित है। आज भी वह गाँव मौजूद है। कई लोग इसको ‘सजिस्तान’ भी कहते है। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने ही भारत में ‘चिश्ती सम्प्रदाय’ का प्रचार-प्रसार अपने सद्गुरु ख़्वाजा उस्मान हारुनी के दिशा-निर्देशों पर किया किया। इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अपने पिता के संरक्षण में हुई। जिस समय ख़्वाजा मुईनुद्दीन मात्र ग्यारह वर्ष के थे, तभी इनके पिता का देहांत हो गया। उत्तराधिकार में इन्हें मात्र एक बाग़ की प्राप्ति हुई थी। इसी की आय से जीवन निर्वाह होता था। संयोग या दैवयोग से इनके बाग़ में एक बार हज़रत इब्राहिम कंदोजी का शुभ आगमन हुआ। इनकी आवभगत से वह अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने इनके सिर पर अपना पवित्र हाथ फेरा तथा शुभाशीष दी। इसके बाद इनके हृदय में नवचेतना का संचार हुआ। सर्वप्रथम ये एक वृक्ष के नीचे समाधिस्थ हुए, परन्तु राज कर्मचारियों द्वारा यह कहने पर कि यहाँ तो राजा की ऊँटनियाँ बैठती हैं, ये वहाँ से नम्रतापूर्वक उठ गए। राजा के ऊँट-ऊँटनियाँ वहाँ से उठ ही न पाए तो कर्मचारियों ने क्षमा-याचना की। इसके बाद इनका निवास एक तालाब के किनारे पर बना दिया गया, जहाँ पर ख़्वाजा मुईनुद्दीन दिन-रात निरंतर साधना में निमग्र रहते थे। वे अक्सर दुआ माँगते कि “ए अल्लाह त आला/परब्रह्म स्वामी जहाँ कहीं भी दु:ख दर्द और मेहनत हो, वह मुझ नाचीज को फरमा दे।” ख़्वाजा मुईनुद्दीन ने अनेकों हज पैदल ही किए।

मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

यह माना जाता है कि ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती सन 1195 ई में मदीना से भारत आए थे। वे ऐसे समय में भारत आए, जब मुहम्मद ग़ोरी की फौज अजमेर के राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान से पराजित होकर वापस ग़ज़नी की ओर भाग रही थी। भागती हुई सेना के सिपाहियों ने ख़्वाजा मुईनुद्दीन से कहा कि आप आगे न जाएँ। आगे जाने पर आपके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, चूंकि मुहम्मद ग़ोरी की पराजय हुई है। किंतु ख़्वाजा मुईनुद्दीन नहीं माने। वह कहने लगे- “चूंकि तुम लोग तलवार के सहारे दिल्ली गए थे, इसलिए वापस आ रहे हो। मगर मैं अल्लाह की ओर से मोहब्बत का संदेश लेकर जा रहा हूँ।” थोड़ा समय दिल्ली में रुककर वह अजमेर चले गए और वहीं रहने लगे। मुईनुद्दीन चिश्ती हमेशा ईश्वर से दुआ करते थे कि वह उनके सभी भक्तों का दुख-दर्द उन्हें दे दे तथा उनके जीवन को खुशियों से भर दे। उन्होंने कभी भी अपने उपदेश किसी किताब में नहीं लिखे और न ही उनके किसी शिष्य ने उन शिक्षाओं को संकलित किया। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने हमेशा राजशाही, लोभ और मोह आदि का विरोध किया। उन्होंने कहा कि- “अपने आचरण को नदी की तरह पावन व पवित्र बनाओ तथा किसी भी तरह से इसे दूषित न होने देना चाहिए। सभी धर्मों को एक-दूसरे का आदर करना चाहिए और धार्मिक सहिष्णुता रखनी चाहिए। ग़रीब पर हमेशा अपनी करुणा दिखानी चाहिए तथा यथा संभव उसकी मदद करनी चाहिए। संसार में ऐसे लोग हमेशा पूजे जाते हैं और मानवता की मिसाल क़ायम करते हैं।”

मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

अजमेर शरीफ दरगाह का निर्माण और वास्तुकला अद्भुत है। इस दरगाह का निर्माण कई चरणों तथा कई शासकों द्वारा कराया गया था। दरगाह शरीफ में दाखिल होने के चारों तरफ दरवाजे है जिसमें सबसे आलिशान दरवाजा दरगाह बाज़ार की तरफ़ से है जिसकों निजाम गेट कहते है । यह दरवाजा 1912ई° में जनाब मीर उस्मान अली खाँ साबिक़ नवाज़ हैदराबाद का बनवाया हुआ है ।इसलिए इसको उस्मानी दरवाजा भी कहते है । निजाम गेट से दरगाह शरीफ में दाखिल होते ही कुछ ही दूरी पर पुरानी किस्म का दरवाजा है ।इसके ऊपर शाही जमाने का नक्कारखाना है ।इस दरवाजे को शाहजहाँ ने बनवाया था इसी वजह से यह दरवाजा नक्कारखाना शाहजहानी के नाम से मशहूर है। दरगाह का एक दरवाजा बुलंद दरवाजे के नाम से जाना जाता है । यह दरवाजा सुल्तान महमूद खिलजी ने बनवाया था इसकी ऊचाई 85 फुट है तथा यह दरगाह शरीफ की कुल इमारतों में सबसे ऊचा है इसलिए इसे बुलंद दरवाजा कहते है । बुलंद दरवाजे के दायीं तरफ बड़ी देग है जिसे बादशाह अकबर ने चित्तौडगढ़ की फतह के बाद अजमेर शरीफ दरगाह में बनवायी थी । यह देग इतनी बड़ी है की सवा सौ मन चावल एक बार में पकायें जा सकते है। बुलंद दरवाजे के बायीं तरफ छोटी देग है जिसको सुल्तान जहांगीर ने भेंट किया था । इसमें 80 मन चावल एक साथ पकाया जा सकता है। अजमेर शरीफ दरगाह में बादशाह अकबर के द्वारा बनायी गई अकबरी मस्जिद भी है जिसको बादशाह अकबर ने शहजादे सलीम जहांगीर कि पैदाइश की खुशी में बनवाया था । इसके अलावा भी और भी कई निर्माण शासकों द्वारा कराये गये है महफिल खाना जिसको नवाब बशीरूद्दौला ने अपने पुत्र प्राप्ति की खुशी में बनवाया था।यहाँ ख्वाजा की शान में कव्वाली की महफ़िल सजती है। दरगाह को पक्का कराने का काम माण्डू के सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी ने करवाया था ।दरगाह के अदंर बेहतरीन नक्काशी किया हुआ एक चांदी का कटघरा है ।कटघरे के अदंर ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का मजार है । यह कटघरा जयपुर के महाराजा जयसिंह ने बनवाया था ।

मोइनुद्दीन चिश्ती

परिवहन: – दरगाह अजमेर शरीफ राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित है। यह शहर सड़क, रेल, वायु परिवहन द्वारा शेष देश से जुड़ा हुआ है। जयपुर से, अजमेर दक्षिणपश्चिम के लिए केवल 132 किलोमीटर की दूरी पर है अजमेर जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और पुष्कर जैसे निकटवर्ती पर्यटन स्थलों से आसानी से पहुंचा जा सकता है। अजमेर का रेलवे जंक्शन है और भारतीय रेलवे के पश्चिमी रेलवे डिवीजन के अंतर्गत आता है।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.