Nizamuddin Dargah Delhi (حضرت خواجة نظام الدّین اولیا) (1325-1236) चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता की मिसाल पेश की, कहा जाता है कि 1303 में इनके कहने पर मुगल सेना ने हमला रोक दिया था, इस प्रकार ये सभी धर्मों के लोगों में लोकप्रिय बन गए। हजरत साहब ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्यागे और उसी वर्ष उनके मकबरे का निर्माण आरंभ हो गया, किंतु इसका नवीनीकरण 1562 तक होता रहा। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हजरत निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा सूफी काल की एक पवित्र दरगाह है। निज़ामुद्दीन दरगाह केवल एक प्रसिद्ध आकर्षण ही नहीं है बल्कि यह एक प्रसिद्ध सूफी सन्त निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह है। दिल्ली के निज़ामुद्दीन पश्चिमी क्षेत्र में स्थित यह दरगाह न केवल प्रतिवर्ष हजारों मुस्लिम तीर्थ यात्रियों को आकर्षित करता है बल्कि अन्य धर्मों के लोग भी यहाँ आते हैं। निज़ामुद्दीन दरगाह परिसर में इनायतख़ान, मुगल राजकुमारी जहाँआरा बेगम और प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो की कब्रें हैं। निज़ामुद्दीन दरगाह के परिसर के साथ-साथ आसपास का क्षेत्र भी काफी लोकप्रिय है। पूर्वी और पश्चिमी निज़ामुद्दीन भागों में विभाजित होने के साथ इसके पश्चिमी भाग में दरगाह परिसर और बाज़ार है जिसमें अधिकतर मुस्लिम दुकानदार हैं जबकि पूर्वी भाग में अमीर वर्ग के लोग रहते हैं। यह क्षेत्र निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन और हुमायूँ के मकबरे के बीच स्थित है।

निजामुद्दीन दरगाह

दरगाह में संगमरमर पत्थर से बना एक छोटा वर्गाकार कक्ष है, इसके संगमरमरी गुंबद पर काले रंग की लकीरें हैं। मकबरा चारों ओर से मदर ऑफ पर्ल केनॉपी और मेहराबों से घिरा है, जो झिलमिलाती चादरों से ढकी रहती हैं। यह इस्लामिक वास्तुकला का एक विशुद्ध उदाहरण है। दरगाह में प्रवेश करते समय सिर और कंधे ढके रखना अनिवार्य है। धार्मिक गीत और संगीत इबादत की सूफी परंपरा का अटूट हिस्सा हैं। दरगाह में जाने के लिए सायंकाल 5 से 7 बजे के बीच का समय सर्वश्रेष्ठ है, विशेषकर वीरवार को, मुस्लिम अवकाशों और त्यौहार के दिनों में यहां भीड़ रहती है। इन अवसरों पर कव्वाल अपने गायन से श्रद्धालुओं को धार्मिक उन्माद से भर देते हैं। यह दरगाह निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक मथुरा रोड से थोड़ी दूरी पर स्थित है। यहां दुकानों पर फूल, लोहबान, टोपियां आदि मिल जाती हैं। अमीर खुसरो, हज़रत निजामुद्दीन के सबसे प्रसिद्ध शिष्य थे, जिनका प्रथम उर्दू शायर तथा उत्तर भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत की एक विधा ख्याल के ज्ानक के रूप में सम्मान किया जाता है। खुसरो का लाल पत्थर से बना मकबरा उनके गुरु के मकबरे के सामने ही स्थित है। इसलिए हजरत निज़ामुद्दीन और अमीर खुसरो की बरसी पर दरगाह में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उर्स (मेले) आयोजित किए जाते हैं। अमीर खुसरो, जहांआरा बेगम और इनायत खां के मकबरे भी निकट ही बने हैं।

निजामुद्दीन दरगाह दिल्ली

हज़रत ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म 1238 में उत्तरप्रदेश के बदायूँ जिले में हुआ था। ये पाँच वर्ष की उम्र में अपने पिता, अहमद बदायनी, की मॄत्यु के बाद अपनी माता, बीबी ज़ुलेखा के साथ दिल्ली में आए। इनकी जीवनी का उल्लेख आइन-इ-अकबरी, एक 16 वीं शताब्दी के लिखित प्रमाण में अंकित है, जो कि मुगल सम्राट अकबर के एक नवरत्न मंत्री ने लिखा था | 1269 में जब निज़ामुद्दीन 20 वर्ष के थे, वह अजोधर (जिसे आजकल पाकपट्ट्न शरीफ, जो कि पाकिस्तान में स्थित है) पहुँचे और सूफी संत फरीद्दुद्दीन गंज-इ-शक्कर के शिष्य बन गये, जिन्हें सामान्यतः बाबा फरीद के नाम से जाना जाता था। निज़ामुद्दीन ने अजोधन को अपना निवास स्थान तो नहीं बनाया पर वहाँ पर अपनी आध्यात्मिक पढाई जारी रखी, साथ ही साथ उन्होंने दिल्ली में सूफी अभ्यास जारी रखा। वह हर वर्ष रमज़ान के महीने में बाबा फरीद के साथ अजोधन में अपना समय बिताते थे। इनके अजोधन के तीसरे दौरे में बाबा फरीद ने इन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, वहाँ से वापसी के साथ ही उन्हें बाबा फरीद के देहान्त की खबर मिली।

निज़ामुद्दीन, दिल्ली के पास, ग़यासपुर में बसने से पहले दिल्ली के विभिन्न इलाकों में रहे। ग़यासपुर, दिल्ली के पास, शहर के शोर शराबे और भीड़-भड़क्के से दूर स्थित था। उन्होंने यहाँ अपना एक “खंकाह” बनाया, जहाँ पर विभिन्न समुदाय के लोगों को खाना खिलाया जाता था, “खंकाह” एक ऐसी जगह बन गयी थी जहाँ सभी तरह के लोग चाहे अमीर हों या गरीब, की भीड़ जमा रहती थी। इनके बहुत से शिष्यों को आध्यात्मिक ऊँचाई की प्राप्त हुई, जिनमें ’ शेख नसीरुद्दीन मोहम्मद चिराग-ए-दिल्ली” , “अमीर खुसरो”, जो कि विख्यात विद्या ख्याल/संगीतकार और दिल्ली सलतनत के शाही कवि के नाम से प्रसिद्ध थे।

इनकी मृत्यु 3 अप्रेल 1325 को हुई। इनकी दरगाह, हजरत निज़ामुद्दीन दरगाह दिल्ली में स्थित है।

बताया जाता है कि इस शुरुआत के पीछे एक दिलचस्प घटना है। हजरत निजामुद्दीन को अपनी बहन के लड़के सैयद नूह से अपार स्नेह था। नूह बेहद कम उम्र में ही सूफी मत के विद्वान बन गए थे और हजरत अपने बाद उन्हीं को गद्दी सौंपना चाहते थे। लेकिन नूह का जवानी में ही देहांत हो गया। इससे हजरत निजामुद्दीन को बड़ा सदमा लगा और वह बेहद उदास रहने लगे। अमीर खुसरो अपने गुरु की इस हालत से बड़े दुखी थे और वह उनके मन को हल्का करने की कोशिशों में जुट गए। इसी बीच वसंत ऋतु आ गई। एक दिन खुसरो अपने कुछ सूफी दोस्तों के साथ सैर के लिए निकले। रास्ते में हरे-भरे खेतों में सरसों के पीले फूल ठंडी हवा के चलने से लहलहा रहे थे। उन्होंने देखा कि प्राचीन कलिका देवी के मंदिर के पास हिंदू श्रद्धालु मस्त हो कर गाते- बजाते नाच रहे थे। इस माहौल ने खुसरो का मन मोह लिया। उन्होंने भक्तों से इसकी वजह पूछी तो पता चला कि वह ज्ञान की देवी सरस्वती को खुश करने के लिए उन पर पर सरसों के फूल चढ़ाने जा रहे हैं। तब खुसरो ने कहा, मेरे देवता और गुरु भी उदास हैं। उन्हें खुश करने के लिए मैं भी उन्हें वसंत की भेंट, सरसों के ये फूल चढ़ाऊंगा। खुसरो ने सरसों और टेसू के पीले फूलों से एक गुलदस्ता बनाया। इसे लेकर वह निजामुद्दीन औलिया के सामने पहुंच कर खूब नाचे-गाए। उनकी मस्ती से हजरत निजामुद्दीन की हंसी लौट आई। तब से जब तब खुसरो जीवित रहे, वसंत पंचमी का त्योहार मनाते रहे। खुसरो के देहांत के बाद भी चिश्ती सूफियों द्वारा हर साल उनके गुरु निजामुद्दीन की दरगाह पर वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाने लगा।

निजामुद्दीन

परिवहन: – यह दरगाह निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक मथुरा रोड से थोड़ी दूरी पर स्थित है। दरगाह के आसपास का क्षेत्र भी संत निजामुद्दीन के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र दो भागों में बंटा हुआ है एक निजामुद्दीन वेस्ट जहां दरगाह ‌और निजामुद्दीन मार्केट स्थित है, जहां दुकानों पर फूल, लोहबान, टोपियां आदि मिल जाती हैं। दूसरा‌ निजामुद्दीन ईस्ट जहां अच्छा खासा रिहायशी क्षेत्र है जो हुमायूं के मकबरे और निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बीच स्थित है।

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