Gomateshwar Temple श्रवणबेलगोला कर्नाटक राज्य के मैसूर शहर में स्थित है। श्रवणबेलगोला मैसूर से 84 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ का मुख्य आकर्षण गोमतेश्वर/ बाहुबलि स्तंभ है। बाहुबलि मोक्ष प्राप्त करने वाले प्रथम तीर्थंकर थे। श्रवणबेलगोला नामक कुंड पहाड़ी की तराई में स्थित है। बारह वर्ष में एक बार होने वाले महामस्ताभिषेक में बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। यहाँ पहुँचने के रास्ते में छोटे जैन मंदिर भी देखे जा सकते हैं।

श्रवणबेलगोला में पर्यटकों की पहली पसंद गोम्मतेश्वर मूर्ति इस नगर का मुख्य आकर्षण है। 17 मीटर या 58 फीट ऊंची यह मूर्ति पूरे विश्व में एक पत्थर से निर्मित (एकाश्म) सबसे विशालकाय मूर्ति है। इस मूर्ति को गंग वंश के राजा राजमल्ल एवं उसके सेनापित चामुंडराय नें बनवाया था। वेनूर गाँव कीयात्रा पर आये पर्यटकों को 1604 ई0 में जैन शासक राजा थिम्मन्ना अलिजा द्वारा निर्मित गोमतेश्वर प्रतिमा को देखने अवश्य आना चाहिये। इस पत्थर से बनी प्रतिमा का मूर्तिकार अमरशिल्पी जाकनचारी माना जाता है। एक पत्थर से बनी भगवान गोमतेश्वर की यह मूर्ति फाल्गुनी नदी के तट पर स्थित है।  35 फीट ऊँची यह एक प्रस्तर प्रतिमा कर्नाटक की 4 बाहुबली मीर्तियों में सबसे छोटी है (अन्य मूर्तियाँ करकला, धर्मस्थल और श्रवणबेलागोला में स्थित हैं)। वेनूर के गोमतेशव्र प्रतिमा की विशेषता यह है कि यह मूर्ति एक चबूतरे पर बिना किसी सहारे के स्थित है। यहां पर यात्रियों को कन्नड़ व तमिल भाषा में लिखे लेख देखने को मिलते हैं। इन लेखो में राजा एवं उसके जनरल द्वारा मूर्ति को बनाये जाने के प्रयासों की प्रशंसा की गई है। हजारों भक्त, खासतौर पर जैन, 12 साल में एक बार मनाये जाने वाले उत्सव महामस्ताभिषेक में यहां आते हैं। महामस्ताभिषेक उत्सव में गोमतेश्वर प्रतिमा का का अभिषेक किया जाता है। दुनिया की सबसे ऊंची इस एकाश्म मूर्ति को केसर, घी, दूध, दही, सोने के सिक्कों तथा कई अन्य वस्तुओं से नहलाया जाता है।

करीब 158 किलोमीटर बेंगलुरु और 83 किलोमीटर मैसूर की दूरी पर, कर्नाटक में स्थित एक शहर है, जो तालाबों और मंदिरों के शहर के रूप में जाना जाता है – श्रवणबेलागोला दक्षिण भारत में यह सबसे प्रसिद्ध जैन तीर्थयात्रा है। यह जगह कर्नाटक की प्रसिद्ध विरासत स्थलों में से एक है। जगह श्रावणबेलागोला अपने गोमतेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है जिसे बाहुबली मंदिर भी कहा जाता है। श्रवणबेलगोला में दो पहाड़ी, विंधीगिरि और चंद्रगिरी हैं। बाहुबली की 58 फीट ऊंची मोनोलीथिक प्रतिमा विंधीगिरि हिल पर स्थित है। प्रतिमा के आधार पर एक शिलालेख है, जो राजा की स्तुति करता है जो इस प्रयास को वित्त पोषित करता था और उसके सामान्य, चावंडरया, जिन्होंने अपनी मां के लिए मूर्ति की स्थापना की थी बाहुबली प्रतिमा दोनों शानदार और बहुमूल्य है। रूप में शानदार, यह लगभग 983 एडी में निर्मित एक 57 फीट ऊंची अखंड प्रतिमा है। गोमतेश्वर की प्रतिमा को 30 किमी की दूरी पर देखा जा सकता है।

गोमतेश्वर मंदिर

जैन ग्रंथों के अनुसार, बाहुबली या गोमतेश्वर प्रथम जैन, ऋषद्देव या आदिनाथ के तीर्थंकर का दूसरा पुत्र था। ऐसा कहा जाता है कि आदिनाथ के पास कुल 100 बेटियां थीं जब ऋषबदेव ने अपना राज्य छोड़ा, तो साम्राज्य के लिए अपने दोनों पुत्रों- भरत और बाहुबली के बीच एक झगड़ा हुआ। हालांकि बाहुबली ने युद्ध में भरत को हराया लेकिन वह और उसके भाई के बीच खट्टे होने के कारण खुश नहीं थे। इस प्रकार, उन्होंने अपना राज्य भरत को देने का फैसला किया और केवला ज्ञान (संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त करने के लिए चला गया। प्रतिमा को कर्नाटक के कन्नड़ लोगों द्वारा ‘गोमातेश्वर की मूर्ति’ के रूप में संदर्भित किया जाता है और इसे जैनियों द्वारा बाहुबली के रूप में जाना जाता है। हर बारह वर्ष, श्रावणबेलागोला पहाड़ी में, हजारों भक्त, पर्यटक ‘महामात्काभिषेक उत्सव’ का जश्न मनाने आए हैं। भक्त एक मूर्ति पर एक उच्च मंच से पानी छिड़कते हैं। पानी छिड़का जाने के बाद, मूर्ति कई टन दूध, गन्ना का रस, और केसर के फूल पेस्ट से घिरी हुई है। अगले महामताकाभिषेक त्योहार वर्ष 2018 में आयोजित होने की संभावना है।

गोमतेश्वर मंदिर

यह स्थान चन्द्रबेत और इन्द्रबेत नामक पहाड़ियों के बीच स्थित है। प्राचीनकाल में यह स्थान जैन धर्म एवं संस्कृति का महान केन्द्र था। जैन अनुश्रुति के अनुसार मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने राज्य का परित्याग कर अंतिम दिन मैसूर के श्रवणबेलगोला में व्यतीत किये। यहाँ के गंग शासक रचमल्ल के शासनकाल में चामुण्डराय नामक मंत्री ने लगभग 983 ई. में बाहुबलि (गोमट) की विशालकाय जैन मूर्ति का निर्माण करवाया था। यह प्रतिमा विंद्यागिरी नामक पहाड़ी से भी दिखाई देती है। बाहुबलि प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के पुत्र माने जाते हैं। कहा जाता है कि बाहुबलि ने अपने बड़े भाई भरत के साथ हुए घोर संघर्ष के पश्चात् जीता हुआ राज्य उसी को लौटा दिया था। बाहुबलि को आज भी जैन धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। चन्द्रबेत और इन्द्रबेत उपर्युक्त दोनों ही पहाड़ियों पर प्राचीन ऐतिहासिक अवशेष बिखरे पड़े हैं। बड़ी पहाड़ी इन्द्रगिरि पर ही गोमतेश्वर की मूर्ति स्थित है। यह पहाड़ी 470 फुट ऊँची है। पहाड़ी के नीचे कल्याणी नामक झील है, जिसे धवलसरोवर भी कहते हैं। बेलगोल कन्नड़ का शब्द है। जिसका अर्थ धवलसरोवर है। गोमतेश्वर की मूर्ति मध्ययुगीन मूर्तिकला का अप्रितम उदाहरण है। फ़र्ग्युसन के मत में मिस्र देश को छोड़कर संसार में अन्यत्र इस प्रकार की विशाल मूर्ति नहीं बनाई गई है।

श्रवणबेलगोला में स्थापित गोमतेश्वर की प्रतिमा के लिए यह मान्यता है कि इस मूर्ति में शक्ति, साधुत्व, बल तथा उदारवादी भावनाओं का अद्भुत प्रदर्शन होता है। इस मूर्ति का अभिषेक विशेष पर्वों पर होता है। इस विषय का सर्वप्रथम उल्लेख 1398 ई. का मिलता है। इस मूर्ति का सुन्दर वर्णन 1180 ई. में वोप्पदेव कवि के द्वारा रचित एक कन्नड़ शिलालेख में है। श्रमणबेलगोल से प्राप्त दो स्तम्भलेखों में पश्चिमी गंग राजवंश के प्रसिद्ध राजा नोलंबांतक, मारसिंह (975 ई.) और जैन प्रचारक मम्मलीषेण (1129 ई.) के विषय में सूचना प्राप्त होती है, जिसने वैष्णवों तथा जैनों के पारस्परिक विरोधों को मिटाने की चेष्टा की थी और दोनों सम्प्रदायों को समान अधिकार दिए थे।

परिवहन: – श्रवणबेलगोलाके लिए सबसे नजदीकी स्टेशन चन्नरयापत्न है। आप बंगलौर एवं मैसूर दोनों से चन्नरयापत्न के लिए बस ले सकते हैं। शेष यात्रा स्थानीय परिवहन के माध्यम से पूरी की जा सकती है।

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