हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi in Mumbai) का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान गणेश के जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह त्योहार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह त्योहार देश के हर एक हिस्से में मनाया जाता है। हालांकि, देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी के बाद 10 दिन बाद तक गणेशोत्सव मनाया जाता है। इस दौरान श्रद्धालु अपने घर में भगवान श्री गणेश की मूर्ति स्थापित करते हैं और पूरे दस दिन इस दौरान गणेश भगवान की पूजा की जाती है। इसके बाद इसके बाद आखिरी दिन यानि अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति जी का विसर्जन किया जाता है।

इस बार गणेशोत्सव 10 दिन का ना होकर, 11 दिनों का होगा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस अवधि में दो दशमी तिथि पड़ रही हैं। इस बार 31 अगस्त 2017 और एक सितंबर दोनों ही दिन दशमी तिथि रहेगी। गणोत्सव 25 अगस्त 2017 से शुरु होकर पांच सितंबर अनंत चतुर्दशी तक चलेगा। हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का दिन बेहद शुभ माना जाता है। कई लोग इस दिन शुभ कार्य की शुरुआत करते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत इस दिन करने से फल अच्छा मिलता है।

गणेश चतुर्थी का साल भर में पड़ने वाली सभी चतुर्थियों में सबसे अहम महत्व है। इस दिन गणेश के भक्त अपने घर में भगवान गणेश को स्थापित करते हैं। बताया जाता है कि इस दिन गणेश जी की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और संपन्नता आती है। इस दिन कई लोग व्रत रखते हैं। व्रत रखने से भगवान गणेश खुश होते हैं और श्रद्धालूओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। गणेश जी की मूर्ति को घर में मंदिर में रखना होता है। इनके लिए मंदिर में एक अलग जगह बनाई जाती है।

गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र में बडी़ धूमधाम से मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार इसी दिन गणेश का जन्म हुआ था।गणेश चतुर्थी पर हिन्दू भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस प्रतिमा का नो दिन तक पूजन किया जाता है। बड़ी संख्या में आस पास के लोग दर्शन करने पहुँचते है। नो दिन बाद गाजे बाजे से श्री गणेश प्रतिमा को किसी तालाब इत्यादि जल में विसर्जित किया जाता है।

पुराणानुसार

शिवपुराण में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण-तिथि बताया गया है जबकि गणेशपुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था। गण + पति = गणपति। संस्कृतकोशानुसार ‘गण’ अर्थात पवित्रक। ‘पति’ अर्थात स्वामी, ‘गणपति’ अर्थात पवित्रकोंके स्वामी।

गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन –
गणेश चतुर्थी के दिन चांद के दर्शन करना वर्जित माना गया है। लोगों का मानना है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मनुष्य किसी कंलक का दोषी बनता है। माना जाता हैं कि इस दिन चन्द्र दर्शन से भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नामक मणि की चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। भगवान कृष्ण ने भी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का चांद देखा था जिसकी वजह से उन्हें इस कलंक दोष का श्राप लगा है। तब से लेकर आज तक यही प्रथा चली आ रही है। लोग इस दिन के चांद को दोषपूर्ण मानते है।

अपनी सभी परेशानियों से मुक्त होने के लिए आप गणेश चतुर्थी का व्रत करें, इससे आप अपने सभी दोषों से दूर कर सकते है। कुछ ऐसा ही परामर्श नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को उन पर लगे कलंक के दोष को दूर करने के लिए दिया था।

गणेश चतुर्थी का व्रत एवं पूजन विधि

सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्‍त होकर दोपहर के समय अपनी इच्छा के अनुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित करें। गणेश चतुर्थी व्रत का संकल्प लें। संकल्प मंत्र के बाद श्रीगणेश की षोड़शोपचार (16 सामग्रियों से) पूजन-आरती करें। गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं। गणेश मंत्र (ऊं गं गणपतयै नम:) का जप करते हुए 21 दूर्वा दल चढ़ाएं। भगवान श्रीगणेश को गुड़ या बूंदी के 21 लड्डुओं का भोग लगाएं। इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास रख दें तथा 5 ब्राह्मण को दान कर दें और शेष लड्डू प्रसाद के रूप में बांट दें। पूजा में श्रीगणेश स्त्रोत, अथर्वशीर्ष, संकटनाशक स्त्रोत आदि का पाठ करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा प्रदान करने के बाद रात के समय चांद को अर्घ्‍य देकर स्वयं भोजन करें।

गणेश चतुर्थी की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह सहायता मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे।

देवताओं की बात सुनकर शिवजी ने कार्तिकेय व गणेशजी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की सहायता के लिए पहले जाएगा।

भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परंतु गणेशजी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा।

तभी उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश जी अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिवजी ने श्रीगणेश से पृथ्वी की परिक्रमा न करने का कारण पूछा।

तब गणेश जी ने कहा – ‘माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।’

यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे।

गणेश पूजन का शुभ समय

मध्‍याह्न गणेश पूजन समय : 11.06 से 13.39 तक

समयावधि : 2 घंटे 33 मिनट

24 तिथि को इस समय चंद्रमा ना देखें : 20.27 से 20.43 तक

समयावधि : 16 मिनट

25 तिथि को इस समय चंद्रमा ना देखें : 9.10 से 21.20 तक

समयावधि : 12 घंटे 9 मिनट

चतुर्थी तिथि की शुरुआत : 24 अगस्‍त की रात्रि को 8 बजकर 27 मिनट पर

चतुर्थी तिथि की समाप्‍त : 25 अगस्‍त को 8 बजकर 31 मिनट पर

कैसे करें पूजा-

  •  इस महापर्व के दिन लोग भगवान गणेश की पूजा करने के लिए प्रातः काल उठकर मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर, विधि अनुसार उनका पूजन करते हैं।
  •  पूजन के बाद रात्रि में चंद्रमा को जल चढ़ाकर पूजा करने वाले ब्राह्मणों को दान दिया जाता है। मान्यतानुसार इस दिन के चंद्रमा को देखना अशुभ माना जाता है, इसलिए चतुर्थी के दिन का चांद नहीं देखना चाहिए।
  •  गणपति की पूजा में लड्डूओं का भोग लगाने का विधान है और आप भी अपने सामर्थ के अनुसार गणेश जी भोग लगाकर भगवान को खुश कर सकते है।

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